Wardha

जब वर्धा में पैर रखा था तब ये बिलकुल एहसास नही था की वर्धा से मोहब्बत भी हो सकती है और होता भी क्यों वहाँ की वादियाँ जब मन को लुभाती हैं तो सब कुछ अच्छा लगता है. जब वही अपने असली रूप में आ जाती हैं तो एकदम निरसता से भर जातीं हैं। इसके बावजूद भी शाम में जब गर्मी को गर्मी काटती है ये बात सच दिखती थी तो एकदम चेहरे पर मुस्कान खिल जाती थी। 

वर्धा में चाहे दिन धूप में क्यों ना बीता हो लेकिन शाम का आनंद लेने के लिए दीपू की दुकान पर जब बैठकर घंटों बकवास बाज़ी करके बीता देते थे तो वो दिन पूरा बेहतर वाले दिन में गिना जाने लगता था। शायद यह दीपू के चाय का ही असर होगा जो लोगों में इतनी ऊर्जा भर देता था और कुछ लोग तो सिर्फ़ वहाँ यह देखने के लिए बैठे होते थे की आज कौन कौन आएगा किसका किसका मामला सेट होगा कौन किसके साथ है और कुछ ऐसे भी आशिक़ देखे मैंने जो सिर्फ़ घंटों बैठ कर किसी एक का इंतज़ार करते और उसके दर्शन पाकर खुद को धन्य समझते ऐसा लगता था देवी मैया बड़ी मनौती के बाद उसको भेजी हैं। वर्धा जैसे छोटी जंग में इतने प्यारे लोगों का होना इस बात का सबूत है कि जगह इंसानो से ही बनती है वर्धा के लोकल लोग इतने साफ़ दिल के और इतने शालीन थे की मैंने कभी वहाँ के लोगों को लड़ते हुए नही देखा ये बातें यहाँ आने के बाद मैं नोटिस कर रही हूँ और यह सोच रही  हूँ कि 

ये ज़रूरी नही है तुम किसी बड़े शहर में रहो तो हाई तुम प्रग्रेसिव और आधुनिक कहलाओगे वर्धा के २ साल में मैंने जाना की लोग कितने अलग होते हैं भले  ही वो तुम्हारी  तरफ़ से हों लेकिन उनका तौर तरीक़ा बात व्यवहार सब कुछ अलग होता है। 

जब पेड़ों से पत्ते गिर जाते हैं तो मौसम एकदम शुष्क हो जाता है और गर्मी तो इतनी की मौत आ जाए लेकिन इसके वीपरीत उसी धूप में पहाड़ चढ़ना और खुद को ही गाली देना की भकक्क साल यहाँ क्यूँ आ गये इससे अच्छा तो प्राइवट बीएड कर लेते और उसी बीच पीछे से आती लड़कियों के झुंड में से कोई और भी वही बात बोलते हुए तुम्हारे पास  छाता लेकर आ जाए तो बस उस इंसान दुनिया का सबसे प्रिय इंसान बनने में देर नही लगती है। ऐसे ही जीवन की गाड़ी वहाँ चलती है। लेकिन उसको चलाने के लिए आस पास के लोगों की सहभागिता काफ़ी ज़रूरी है। कुछ लोग दिल के क़रीब होते हुए भी इतने दूर हो जाते है और कुछ लोग ना क़रीब होते हुए भी पास हो जाते है। 

पढ़ाई का एक अलग हाई माहौल था सब एक दूसरे को पीछे करने में लगे हुए थे ताकि उनके नम्बर अच्छे आएँ और कुछ लोग ऐसे थे जिनको अध्यापक मिन्नते करके आगे बढ़ने के लिए कहते थे ये आलसी लोग अपने काम भी दूसरों से  ही करवाते थे इनकी लीला ये ही  जाने ख़ैर बात ये है की इन सबके बावजूद कुछ लोग शिक्षक के चहेते थे कुछ लोगों के अलग ही ग्रूप थे ऐसा कह सकते हैं की पूरी कक्षा में विविधता में एकता तो ख़ैर नही थी वो इंटरेग्रेटेड में थी :) लेकिन खूब एक दूसरे की टांग खिंचाई करना एक इंसान हर कक्षा में लगभग गूगल हो का काम बखूबी निभाता है उसको बस छेड़ने के देरी है वो विश्विद्यालय के कुलपति तक की भी ख़बर मुहज़बानी रखता है। 

इन सभी चीजों को समझते बुझते २ साल का कोटा कब पूरा हुआ सच में पता नही चला याद करती हूँ उस वक़्त को तो ऐसा लगता है की कितना अच्छा वक्त था वो लेकिन वो उस समय सबसे बुरा वक़्त लगता था मौसम, पढ़ाई, लोगों का व्यवहार सब एकदम अलग था। अब वो चीज़ें मुझे अच्छी लगती हैं क्योंकि मैंने उन सब चीजों से काफ़ी कुछ सीखा है। विभिन्न परिस्थियों में कैसे जिया जाता है ये मैंने सीखा कैसे दूसरे लोगों की नज़र में अच्छा बना जाता है ये सीखा और भी बहुत कुछ सीखा तो अब यह लगता है की सीखना तभी सम्भव है जब आप खुद उस स्थिति  में होंगे तो बेहतर सीख पाएँगे। 

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