बदलाव
अंतर
गावों में पढ़ाई का माहौल एकदम अलग है। गाँव में लोग एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगातार लगे हुए हैं आए दिन घर पर माँ - पिता जी चिल्लाते हैं की पढ़ ले नही तो कुछ होगा नही गोबर उठाएगा घर पर वो देख फलाने का बेटा / बेटी कितना आगे बढ़ रहा है और तू है की कुछ समझती ही नही इस तरह के ताने सुनकर हम सभी बड़े हुए हैं। कभी कभी इतनी झल्लाहट होती थी कि मन होता था कि घर से भाग जाओ और दोबारा मत वापस आओ क्योंकि उस वक्त हम सिर्फ़ अपने मनोरंजन के लिए स्कूल जाते थे और हवाबाज़ी में रहते थे और सोचते थे कि अरे! पास तो हो जाएँगे। इसको आप लापरवाही कह सकते हैं। क्यूँकि हमको शिक्षा की अहमियत तब तक नही पता थी। कई बार तो स्कूल जाने के लिए पीते भी गये हैं। सबसे बड़ी परेशानी मेरा भाई था। हम दोनो एक हाई स्कूल में पढ़ते थे वो उस समय मेरा सबसे बड़ी दुश्मन हुआ करता था क्योंकि जो भी स्कूल में होता सब का लाईव- टेलीकास्ट वो घर पर आकर करता था. फिर क्या लात -मुक्का और ताने सुनने ही पड़ते थे। कभी-कभी तो बिन मौसम बरसात हो जाती थी मुक्कों की , अजीब ही था सब कुछ. हम रोज़ एक दूसरे की कमियाँ खोज कर घर आकर क्लेश करवाते थे. और जब कोई डाँट खाता तो हम बड़े खुश होते थे। मैं अपने कक्षा में सबसे शरारती लड़की थी. मैं जब कोई लड़की उठती सर को कुछ बताने के लिए तो मैं उसका दुपट्टा बेंच में बांध देती थी. और जब वो जाने लगती थी सर के पास तो बेचारी दुपट्टा खोलती थी आकर और कभी- कभी तो दुपट्टे में पिन लगी होती थी तो उनकी ड्रेस भी हल्की सी फट जाती और पूरी क्लास हँसती उसके ऊपर और बाद में सारी लड़कियों के अंदर इतनी दहशत हो गयी थी मेरी कि, वो जब भी उठती तो दुपट्टा पहले चेक कर लेती। ये सब चीज़ें स्कूल के बाद कभी नही हुई। मेरी इन सभी शरारतों से सब परेशान रहते थे. एक दिन मेरे एक सर ने मुझे बुलाया और मुझसे कहा स्वधा तुम जिस तरह रहती हो किसी की बात नही सुनती हो ये सब अच्छा नही है तुम्हारे लिए, देखना तुम फेल हो जाओगी बारहवीं के परीक्षा में ,मैंने बोला सर इसका इग्ज़ाम से क्या लेना - देना और मैंने जोश में उनसे चैलेंज लगा दिया की मैं फ़र्स्ट क्लास लाकर दिखाऊँगी और अब इतना बोझ बढ़ गया था की पूछो मत! मैं खूब मेहनत करने लगी और फ़र्स्ट आयी मज़े की बात ये है कि उस सर के विषय में मेरे डिक्टेशन मार्क्स आएँ।
शायद यहीं से मैंने अपने अंदर के बदलाव को भाँपा और दिल्ली आ गयी दिल्ली विश्वविद्यालय में आने के बाद अलग तरह की जद्दोजहद शुरू हुई यहाँ सब एकदम ही अलग था। कुछ भी गाँव जैसा नही था, मैं रोज़ सोचती थी कि कुछ तो वैसा ही मिलेगा लेकिन ऐसा कुछ नही था यहाँ आकर मैंने इतना कुछ सीखा जिसको लिखने के लिए एक किताब भी कम पड़ जाएगी छोटी-छोटी चीजों को समझा और सबसे ज़रूरी चीज की अपने आपको जान पायी और अपने हक़ के लिए बोलने में सक्षम हो पायी।
जेंडर गैप को क्लास में पढ़ा और बाहर उस चीज़ को देखा ऐसी तमाम चीजें हैं जिसको समझा, जाना, पहचाना और उसको आत्मसात् किया और आगे बढ़ती गयी। अगर आप वास्तव में दिल्ली को समझना चाहते हैं तो रोज़ बस से यात्रा करना शुरू करिए और फिर देखिए की आपको हर दिन दिल्ली का एक नया रूप दिखाई देगा कुछ चीजों को चाहते हुए भी आप उसको रोक नही पाएँगे और अगर रोक भी लिया तो ऐसा दूसरे दिन नही होगा ये आप कह नही पाएँगे।
दिल्ली में जब शुरू- शुरू में आयी तो ये सब चीज़ें एकदम अजीब और अंदर से झकझोरने वाली लगी थी। लेकिन धीरे धीरे आदत पड़ गयी और जितना हो पाया लोगों कि मदद करते हुए आगे बढ़ने लगी।
@स्वधा त्रिपाठी
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