Wardha
जब वर्धा में पैर रखा था तब ये बिलकुल एहसास नही था की वर्धा से मोहब्बत भी हो सकती है और होता भी क्यों वहाँ की वादियाँ जब मन को लुभाती हैं तो सब कुछ अच्छा लगता है. जब वही अपने असली रूप में आ जाती हैं तो एकदम निरसता से भर जातीं हैं। इसके बावजूद भी शाम में जब गर्मी को गर्मी काटती है ये बात सच दिखती थी तो एकदम चेहरे पर मुस्कान खिल जाती थी। वर्धा में चाहे दिन धूप में क्यों ना बीता हो लेकिन शाम का आनंद लेने के लिए दीपू की दुकान पर जब बैठकर घंटों बकवास बाज़ी करके बीता देते थे तो वो दिन पूरा बेहतर वाले दिन में गिना जाने लगता था। शायद यह दीपू के चाय का ही असर होगा जो लोगों में इतनी ऊर्जा भर देता था और कुछ लोग तो सिर्फ़ वहाँ यह देखने के लिए बैठे होते थे की आज कौन कौन आएगा किसका किसका मामला सेट होगा कौन किसके साथ है और कुछ ऐसे भी आशिक़ देखे मैंने जो सिर्फ़ घंटों बैठ कर किसी एक का इंतज़ार करते और उसके दर्शन पाकर खुद को धन्य समझते ऐसा लगता था देवी मैया बड़ी मनौती के बाद उसको भेजी हैं। वर्धा जैसे छोटी जंग में इतने प्यारे लोगों का होना इस बात का सबूत है कि जगह इंसानो से ही बनती है वर्धा के लोकल ल...