नई शुरुआत
सुबह की शुरुआत एक ताज़ा गर्म चाय के साथ चुस्की लेते हुए और मन ही मन ख़ुद पर इतराते हुए मुग्धा ने ख़ुद को ही सुबह सुबह खूब शाबाशी भरे शब्द बोल डाले। आज की सुबह कितनी खूबसूरत है, ये बड़े दिनों के बाद उसने महसूस किया था। आज कोई भी नकारात्मक ऊर्जा उसके ज़ेहन में नही थी, बहुत दिनों के बाद वो ख़ुद के साथ कुछ वक्त बिताने का सोच कर रजाई ओढ़े बैठी रही। जब उसने अपने गुजरे वक़्त को दोबारा देखा तो, उसे मालूम पड़ा कि ,वो कितनी आसानी से लोगों के चेहरों पर उनके नकाबों पर विश्वास कर लेती है। वो कितनी सीधी और दुनिया कितनी तेज़ है। काफ़ी सारी पुरानी यादों को उसने चाय की चुस्कियों के साथ गटक लिया और एक राहत भरी साँस ली। उसे आज ख़ुद से मिलने की ख़ुशी थी और गम था तो, बस इस बात का की अब तक वो ख़ुद को नही समझ पाई थी।
रिश्ते कभी कभी इतना उलझा देते है कि, उसमें हम ख़ुद को लगातार भूलते चले जाते हैं। मुग्धा आज ऑफिस के लिए बड़े हल्के मन से उठी और चल दी।
©स्वधा त्रिपाठी
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